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रविवार, 2 मई 2010

माँ मुझे डर लगता है !


कल रात मेरे बिस्तर पर मुझे एक आहट ने चौंका दिया,
फिर एक नर्म हवा का झोंका मेरी परेशानी को छु गया,
आँख खुली तो माँ को देखा, कुछ हिलते लब कुछ फडफडाते लब,
मैंने धीरे से मुस्करा दिया,
माँ आज भी उठ कर रातों में मेरी परेशानी को चूमती है,
और अपने हिस्से की भी सब दुआएं मुझ पर फूंका करती है,
बस इतना याद है मुझे के,
मैंने बचपन में बस एक बार कहा था,
माँ मुझे डर लगता है.

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