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बुधवार, 8 अप्रैल 2026

माँ पर निराला जी की भावपूर्ण पंक्तियाँ | Heart Touching Maa Poem in Hindi ❤️

प्रस्तावना (Intro)

माँ का प्रेम इस दुनिया का सबसे पवित्र और निस्वार्थ प्रेम होता है। माँ अपने बच्चों के जीवन को रोशनी से भर देती है और हर कठिनाई से बचाती है। महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी ने माँ के महत्व को बहुत सुंदर शब्दों में व्यक्त किया है।

निराला जी की कविता

"माँ अपने आलोक निखारो, नर को नरक-त्रास से वारो।
पल्लव में रस, सुरभि सुमन में, फल में दल करलव उपवन में,
लाओ चारु चमन चितवन में, स्वर्ग धरा के कर तुम धारो।"

— निराला जी

कविता का सरल अर्थ

इन पंक्तियों में कवि माँ से प्रार्थना कर रहे हैं कि वह अपने प्रकाश से मानव जीवन को सुंदर बनाएं और उसे दुखों से बचाएं। माँ की ममता जीवन को स्वर्ग जैसा बना सकती है।

निष्कर्ष (Conclusion)

माँ का स्थान जीवन में सबसे ऊँचा होता है। हमें हमेशा अपनी माँ का सम्मान करना चाहिए और उन्हें यह महसूस कराना चाहिए कि वे हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण हैं। ❤️

संस्कार Vs आधुनिकता: एक दिल छू लेने वाली कहानी

Introduction (प्रस्तावना)

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान आधुनिक तो हो गया है, लेकिन कहीं न कहीं अपने संस्कार और रिश्तों से दूर होता जा रहा है। माता-पिता, जिन्होंने हमें जीवन दिया, वही कभी-कभी हमारे लिए बोझ बन जाते हैं। यह कहानी हमें परिवार, सम्मान और संस्कार की सच्ची अहमियत समझाती है।

Story (कहानी)

बहू आईने के सामने खड़ी होकर अपनी लिपस्टिक ठीक कर रही थी।
उसने कहा —
“माँ जी, आप अपना खाना खुद बना लेना, आज मुझे और इन्हें एक पार्टी में जाना है।”

बूढ़ी माँ ने धीमे स्वर में कहा —
“बेटी, मुझे गैस चूल्हा चलाना नहीं आता...”

तभी बेटे ने बात काटते हुए कहा —
“माँ, पास के मंदिर में आज भंडारा है, आप वहीं चली जाना। खाना बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।”

माँ बिना कुछ बोले चुपचाप अपनी चप्पल पहनकर मंदिर की ओर चल दी...

यह सब 10 साल का रोहन ध्यान से सुन रहा था।

जब वे पार्टी के लिए रास्ते में थे, तब रोहन ने अपने पापा से कहा —
“पापा, जब मैं बड़ा और अमीर आदमी बन जाऊँगा, तो मैं अपना घर किसी मंदिर के पास ही बनाऊँगा।”

माँ ने हैरानी से पूछा —
“क्यों बेटा?”

रोहन का जवाब सुनकर माँ-बाप दोनों शर्म से झुक गए...

रोहन बोला —
“क्योंकि माँ, जब मुझे भी कभी ऐसी पार्टी में जाना होगा, तब आपको भी तो मंदिर के भंडारे में खाना खाने जाना पड़ेगा।
मैं नहीं चाहता कि आपको किसी दूर के मंदिर तक जाना पड़े...”


पत्थर तब तक सुरक्षित रहता है, जब तक वह पर्वत से जुड़ा होता है।
पत्ता तब तक हरा-भरा रहता है, जब तक वह पेड़ से जुड़ा होता है।
इसी तरह इंसान भी तब तक मजबूत रहता है, जब तक वह अपने परिवार से जुड़ा रहता है।

परिवार से दूर होकर इंसान को भले ही आज़ादी मिल जाए,
लेकिन उसके संस्कार कहीं पीछे छूट जाते हैं...


एक कब्र पर बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ लिखी थीं —

“किसे दोष दूँ इस जिंदगी का ऐ दोस्तों,
दर्द देने वाले भी अपने ही थे,
और मिट्टी में सुलाने वाले भी अपने"

Conclusion (निष्कर्ष)

परिवार ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
माता-पिता का सम्मान और उनकी सेवा करना ही सच्चा धर्म है।
याद रखें —
आज हम जो करेंगे, वही कल हमारे पास लौटकर आएगा।

 Love You Maa

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

एक 8 साल के एक लडके की माँ मर जाती है..!
एक दिन एक आदमी ने उस लडके से पुछा कि,
बेटा, तुझे अपनी नई माँ और अपनी मरी हुई माँ मेँ
क्या फर्क लगा..?

तो वह लडका बोला : मेरी नई माँ सच्ची है और
मरी हुई माँ झुठी थी..!!

यह सुनकर वह आदमी अचरज मेँ पड गया,
फिर बोला : क्यु बेटा तुझे ऐसा लगता है..?
जिसने तुझे अपनी कोख से जन्म दिया वह
झुठी और कल तक आई हुई माँ सच्ची क्यु
लगती है..?

तो लडका बोला : जब मैँ मस्ती करता था तब
मेरी माँ कहती थी कि "अगर तु इस
तरह करेगा तो तुझे खाना नही दुगीँ" फिर भी मैँ
बहुत मस्ती करता रहता था.
और मुझे पुरे गाँव मेँ से ढुढँ कर घर लाती और
अपने पास बिठाकर अपने
हाथो से खाना खिलाती थी..!!

और यह नई माँ कहती है कि "अगर तु
मस्ती करेगा तो तुझे खाना नही दुँगी.... और सच मेँ उसने
मुझे आज तीन दिन से खाना नही दिया।

शनिवार, 28 जुलाई 2012

माँ तू सो जा तुझे नींद आती होगी !

माँ तू सो जा तुझे नींद आती होगी,
मुझे खिलाती रहती हो तुम  क्या खाती होगी.

हर मुसीबत से बच कर यहाँ तक  आया,
शायद  माँ दुआ में हाथ उठाती होगी.

मैं खुश हूँ यहाँ कोई फ़िक्र नहीं है मुझे,
माँ को वहां मेरी याद हर पल आती होगी . 

आते वक़्त वो खुश थी जैसे कोई गम  नहीं,
मुझे पता है मेरी याद उसे रुलाती होगी .

मेरी खैरियत  की हरदम  फ़िक्र मंद है वो,
फ़ोन की हर घंटी  घबरा जाती होगी वो. 

कैसे मैं जाऊ उसके पास मेरे भगवान,
मेरे इंतजार में खिड़की दरवाजे पर आती जाती होगी .

शनिवार, 12 मई 2012


"सभी ब्लॉग दर्शकों को मातृ दिवस की हार्दिक सुभकामनाएँ !"


हे भगवान! मेरी ये जमानत तेरी इस अदालत में रखना,
मैं इस दुनिया में रहूँ या न रहूँ मेरी प्यारी माँ को सही सलामत रखना |

मेरी माँ अनपढ़ है ।

मेरी माँ,
अनपढ़ है ।
वह पढ़ नहीं सकती ।


मगर जब भी मै गावं जाता हूँ,
वह मुझसे लिपटकर
अपने आंसुओ की कलम  से ,
लिखती है कुछ ख़ुशी के गीत  ।


मेरी माँ,
अनपढ़ है ।
वह पढ़ नहीं सकती ।


और जब मै छुट्टियाँ बिताकर लौटता हूँ,
वह गाँव के छोटे से अड्डे तक  आती है।


तब मुझसे लिपटकर
अपने आंसुओ की कलम  से ,
लिखती है कुछ विरह वेदना के गीत ।

मंगलवार, 17 मई 2011

अक्सर माँ कहती है !

  • " तुम किसे ज्यादा प्यार करते हो? मम्मी या पापा? "
  • " बाल गीले हों तो, पंखे के नीचे मत सोओ, तुम्हे ठण्ड लग जाएगी. "
  • " दिनभर टीवी देखोगे तो तुम्हारी आँखे ख़राब हो जाएँगी. "
  • " बार-बार वही पुरानी कहानी सुनकर तुम थकते नहीं ? "
  • " सभी सब्जियां ख़त्म कर दो... नहीं तो तुम्हारी लम्बाई कभी नहीं बढ़ेगी. "
  • " पहुँचते ही मुझे फ़ोन करना मत भूलना... ओ.के. ? "
  • " तुम्हारा कपबोर्ड कपड़ो से भरा हुआ है फिर भी तुम्हारे पास पहनने को कुछ भी नहीं है ? "
  • " पापा को आने दो, फिर देखना ! "
  • " जब मै तुम्हारी उम्र की थी तो मेरी शादी हो चुकी थी ! "
  • " आजकल के बच्चे !!! हम कितने अलग थे ! "
वक़्त के साथ चीज़े बदलती है, शुक्र है कुछ चीज़े बिलकुल नहीं बदलती, खासकर वो माँ होने का अनुभव जिसे मातृत्व कहा जाता है, उदाहरण के लिए वे बातें तो तुम्हारी मम्मी तुमसे कहा करती थी. अब तुम विश्वास करो, या न करो... आप भी उन्ही बातो को दोहराओगे, किसी दिन अपने नन्हे के लिए.

सोमवार, 14 मार्च 2011

माँ से बड़ा न कोई !

स्वामी विवेकानंद जी से एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया," माँ की महिमा संसार में किस कारण से गायी जाती है? स्वामी जी मुस्कराए, उस व्यक्ति से बोले, पांच सेर वजन का एक पत्थर ले आओ | जब व्यक्ति पत्थर ले आया तो स्वामी जी ने उससे कहा, " अब इस पत्थर को किसी कपडे में लपेटकर अपने पेट पर बाँध लो और चौबीस घंटे बाद मेरे पास आओ तो मई तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा |"
            स्वामी जी के आदेशानुसार उस व्यक्ति ने पत्थर को अपने पेट पर बाँध लिया और चला गया | पत्थर बंधे हुए दिनभर वो अपना कम करता रहा, किन्तु हर छण उसे परेशानी और थकान महसूस हुई | शाम होते-होते पत्थर का बोझ संभाले हुए चलना फिरना उसके लिए असह्य हो उठा | थका मांदा वह स्वामी जी के पास पंहुचा और बोला , " मै इस पत्थर को अब और अधिक देर तक बांधे नहीं रख सकूँगा | एक प्रश्न का उत्तर पाने क लिए मै इतनी कड़ी सजा नहीं भुगत सकता |"
            स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले, " पेट पर इस पत्थर का बोझ तुमसे कुछ घंटे भी नहीं उठाया गया और माँ अपने गर्भ में पलने वाले शिशु को पूरे नौ माह तक ढ़ोती है और ग्रहस्थी का सारा काम करती है | संसार में माँ के सिवा कोई इतना धैर्यवान और सहनशील नहीं है इसलिए माँ से बढ़ कर इस संसार में कोई और नहीं | किसी कवी ने सच ही कहा है : -

जन्म दिया है सबको माँ ने पाल-पोष कर बड़ा किया |
कितने कष्ट सहन कर उसने, सबको पग पर खड़ा किया |
माँ ही सबके मन मंदिर में, ममता सदा बहाती है |
बच्चों को वह खिला-पिलाकर, खुद भूखी सो जाती है |
पलकों से ओझल होने पर, पल भर में घबराती है |
जैसे गाय बिना बछड़े के, रह-रह कर रंभाती है |
छोटी सी मुस्कान हमारी, उसको जीवन देती है |
अपने सारे सुख-दुःख हम पर न्योछावर कर देती है |

रविवार, 2 मई 2010

माँ की व्यथा !

मेरी व्यथा अनकही सही अनजानी नहीं है, मुझ जैसी हज़ारों नारियों की कहानी यही है,


जन्म से ही खुद को अबला जाना,
जीवन के हर मोड़ पर परिजनों ने ही हेय माना,

थी कितनी प्रफुल्लित मैं उस अनूठे अहसास से,
रच बस रहा था जब एक नन्हा अस्तित्व मेरी सांसों की तार में,
प्रकृति के हर स्वर में नया संगीत सुन रही थी,
अपनी ही धुन में न जाने कितने स्वप्न बुन रही थी,

लम्बी अमावस के बाद पूर्णिमा का चाँद आया,
एक नन्हीं सी कली ने मेरे आंगन को सजाया,

आए सभी मित्रगण, सम्बन्धी कुछ के चहरे थे लटके,
तो कुछ के नेत्रों में आंसू थे अटके,
भांति भांति से सभी समझाते,
कभी देते सांत्वना तो कभी पीठ थपथपाते,

कुछ ने तो दबे शब्दों में यह भी कह डाला,
घबराओ नहीं, खुलेगा कभी तुम्हारी किस्मत का भी ताला,

लुप्त हुआ गौरव खो गया आनन्द,
अनजानी पीड़ा से यह सोचकर बोझिल हुआ मन,
क्या हुआ अपराध जो ये सब मुझे कोसते हैं,
दबे शब्दों में, मन की कटुता में मिश्री घोलते हैं,

काश! ममता में होता साहस, माँ की व्यथा को शब्द मिल जाते,
चीखकर मेरी नन्हीं कली का सबसे परिचय यूँ कराते,

न इसे हेय, न अबला जानो 'खिलने दो खुशबू पहचानो' |