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शनिवार, 17 अप्रैल 2010

मेरी जिन्दगी मेरी माँ है !


जिन्दगी की तपती धूप में एक ठंडा साया पाया है मैंने,
जब खोली आँख तो अपनी माँ को मुस्कराता हुआ पाया है मैंने,

जब भी माँ का नाम लिया,ओश का बेशुमार प्यार पाया है मैंने,
जब कोई दर्द महसूस हुआ, जब कोई मुश्किल आई,

अपने पहलों में अपनी माँ को पाया है मैंने,
जागती रही वो रात भर मेरे लिए,जाने कितनी रातें,

उससे जगाया है मैंने,
जिन्दगी के हर मोड़ पर, जब हुई गुमराह मैं,

इसकी हिदायत पर, पकड़ ली सीधी राह मैंने,
जिसकी दुआ से हर मुसीबत लौट जाये,

ऐसा फरिस्ता पाया है मैंने,
मेरी हर फ़िक्र को जानने वाली,

मेरे जज्बातों को पहचानने वाली,
मेरी जिन्दगी सिर्फ मेरी माँ है,इसी के लिए तो,

इस जिन्दगी की शमा जला राखी है मैंने।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

मै सबके बीच अकेली थी !


मै रोई माँ काम छोड़कर आई मुझको उठा लिया,
झाड-पोछकर चूम-चूम गीले गालोंको सुखा दिया,

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र-नीर युत दमक उठे,
धुलि हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे,

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मै मतवाली बड़ी हुई,
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई सी दौड़ द्वार पर कड़ी हुई,

लाजभरी आँखे उमंग मेरे मन में रंगीली थी,
तान रसीली थी कानो में चंचल छैन छबीली थी,

दिल में एक चुभन सी भी थी यह दुनिया अलबेली थी,
मन में एक पहेली थी, मै सबके बीच अकेली थी।

रविवार, 14 मार्च 2010

माँ के लिए कविता !

माँ तू कितनी अच्छी है !




तुम चली गयी दुसरे शहर,
उसने बात को समझा.
व्यस्त हो तुम, भूल गयी रोज एक फ़ोन करना,
उसने बुरा नहीं माना.

अपनी तकलीफ पर उसने आंसू बहाए अकेले,
जब तुम्हे तकलीफ हुई, वो रोई तुम्हारे साथ.
जब तुमने कहा," माँ, यह जरूरी है ".
उसने दुआ की तुम्हारे लिए |

शुक्रवार, 5 जून 2009

प्यारो से परेशानी कैसी ?


वह एक युवा माँ थी| उसके होंठो पर हँसी तैरती रहती थी और आँखों में मुस्कान नज़र आती थी| दो छोटी परछाइयां उसके आगे-पीछे नाचती रहती थी| वह जहा भी जाती, ये परछाईया उसके साथ रहतीं| उसका पल्लू पकड़े-पकड़े, उसकी कुर्सी पर झूलते हुए, कभी आगे, कभी पीछे, मटरगश्ती करते| दो चिपकी परछाइयां| किसी ने उनसे पूछा, "क्या तुम्हे खीझ नही होती, चिढ नही मचती? हर दिन तुम्हारे ये दो पुछल्ले तुम्हारे रास्ते में आते रहते है|"

वह हँसी और उसने अपने सुंदर से चेहरे पर झंकार के भाव बनाए| फ़िर उसने जो शब्द कहे, वह सुनने वाले को हमेशा याद रहे| शायद आप भी उन लफ्जो को भूल न पायेंगे| उस युवा माँ ने कहा, "ऐसी नन्ही परियां होना अच्छी बात है, जो आपके साथ दौडे, जब आप खुश हों, तो वे हँसे, जब आप गुनगुनाये तो साथ में वो भी गुनगुन करे| खीझने का तो सवाल ही नही उठता, क्योंकि आपके पास ऐसी परछाइयां तभी हो सकती है, जब आपकी जिन्दगी सूरज की तपन तले हो|"

गुरुवार, 4 जून 2009

माँ की तस्वीर !


घर में माँ की कोई तस्वीर नही
जब भी तस्वीर खिचवाने का मौका आता है
माँ घर में खोई हुई किसी चीज को ढूंढ रही होती है
या लकड़ी घास और पानी लेने गई होती है
जंगल में उसे एक बार बाघ भी मिला
पर वह डरी नही
उसने बाघ को भगाया घास काटी घर आकर
आग जलाई और सबके लिए खाना पकाया

मई कभी घास या लकड़ी लाने जंगल नही गया
कभी आग नही जलाई
मई अक्सर एक जमाने से चली आ रही
पुरानी नक्काशीदार कुर्सी पर बैठा रहा
जिस पर बैठ कर तस्वीरे खिचवाई जाती है
माँ के चेहरे पर मुझे दिखाई देती है
एक जंगल की तस्वीर लकड़ी घास और
पानी की तस्वीर खोई हुई एक चीज की तस्वीर|