माँ शब्द उच्चारते ही लबखुल जाते हैं, मानो कह रहे हों, लो दिल की दरीचे खुल गए , अब भावनाओ की गांठे खोल दो, बहने दो मन को माँ जो सामने है |
Saturday, 28 March 2015
धरोहर !
माँ अपने आलोक निखारो, नर को नरक -त्रास से वारो।
पल्लव में रस , सुरभि सुमन में, फल में दल करलव उपवन में,
लाओ चारु चमन चितवन में, स्वर्ग धरा के कर तुम धारो ।
- निराला जी !
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